“तुझे भूलना भी चाहूँ, लेकिन भुला न पाऊँ”

 

तुझ बिन पड़ी है सूनी, सारी शहर की गलियाँ।

जिस बाग़ में भी जाऊं, खिलती नहीं अब कलियाँ।

सुनता नहीं है कोई, किसे हाल-ए-दिल सुनाऊँ।

तुझे भूलना भी चाहूँ, लेकिन भुला न पाऊँ।

 

ए ख्वाब के मुसाफिर, इक बार मुड़ के आजा।

पलकों में अपनी सुंदर, सी एक झलक दिखाजा।

कर दे वफ़ा बस इतनी, ख्वाबों ही में याद आऊँ ।

तुझे भूलना भी चाहूँ, लेकिन भुला न पाऊँ।

 

                                                                                   —- राज शुक्ल

अवध एक नए युग का आरम्भ —-

बिना अवध के विकास भये यहि भारत बर्ष कय विकास नाही होय सकत है. चाहै लोगन कै विकास होय या बोली भाषा कै. अवधी एक रसीली, रंगीली व हठीली बोली यहि नवके जुग मा एक पेंच के रूप मा काम करत है. चाहे कव्नाव नेता होय या अभिनेता बिना अवधी बोले उनके भला नहीं होय सकत. अगर उदाहरण के तौर पे देखा जाय तव आजु के महानायक अमित भैया यानि की अमिताभ बच्चन का देखा जाय. इनका जवान मान सम्मान बड़ा बाय वोह्के सबसे बड़ा कारन ई उनके अवधी बोलाबव बा. जवने सलीमा मा आपन डायलाग अवधी मा बोलीं है ऊ जरूरे हिट होय गे अहै. इहे नहीं औरव सलीमा येही कारन बहुतै चला. राजनीति क्षेत्र मा देखा जाय तव चाहे वे जवाहर लाल हुवें या फिर अटल बिहारी बाजपेयी, लाल बहादुर शास्त्री हुवे या श्रीमती इंदिरा गाँधी. इनके बोली भाषा इनके सफल हुवे के कारन बनी. आज और नेता लोगे केतनव कोशिश के लेत अहै लेकिन वहि मुकाम पे बिना अवधी के न पहुच पयिहय. जेतना चक्कर राहुल लगावत अहै उत्तर परदेश मा वतना तव बहुत जादा रहा यहि मुकाम पे पहुँचावे की ताईं. आजु जब बात क्षेत्रवाद के उत्तर प्रदेश मा चालत अहै तव हम यहि बात का सरकार से कहा चाहित है की जब उत्तर परदेश का तूरी के अलग अलग राज बनवा जात है तव वोहमा अवध कय भी नाव शामिल कराय कय जरुरत है. बिना येह्के विकासवा संभव नाही अहै और आपन ई अवधी एक रसीली, रंगीली व हठीली बोलियों कय विकास न होय पाए. —– राज शुक्ल – अवध (उत्तर प्रदेश)

“दीपावली २०११ और भारतीयों की व्यथा”

किस बात की है ये दीवाली, किस बात की है ये खुशहाली.

इस लूट के गोरखधंधे में एक राज आज बतलाऊँगा
बच रहो मिठाई खाने से पानी से काम चलाऊंगा
इस राज को राज ही रहने दो सुनने न पाए घरवाली
किस बात की है ये दीवाली, किस बात की है ये खुशहाली.

ये राज मिलावट राज का है गजराज का है युवराज है
पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण हर जनता की आवाज का है.
नेता भर कर झोली खाली सब जन को करते कंगाली
किस बात की है ये दीवाली, किस बात की है ये खुशहाली.

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Happy Deepawali….. Take Care…

—– राज शुक्ल

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“भ्रष्टाचार का शिष्टाचार”

भ्रष्ट हुई अब बोली भाषा भ्रष्ट हुए अब लोग.
ना जाने किस बात का बना आज संजोग.
भ्रष्टाचार के शिष्टाचार में कविता आज सुनाता हूँ.
नेताओं और अभिनेताओं के नाम सभी बतलाता हूँ.
भ्रष्टाचार की जीत हे भाई भ्रष्टाचार की जीत
एक बार आज़ाद हिंद में भई फिर भ्रष्टाचार की जीत.

बात करूँ सन सत्तावन की देश की थी आजादी.
भ्रष्ट हुए कुछ नेताओं ने किया देश बर्बादी.
किया हिंद से भाग अलग और पकिस्तान बनाया.
ना जाने कितने मासूमों ने अपनी जान गवाया.
नहीं रही परवाह किसी की चलने लगी नयी राजनीत
एक बार आज़ाद हिंद में भई फिर भ्रष्टाचार की जीत.

समय चक्र फिर रहा घूमता आया नया नया परिवेश
जान से मार दिया शास्त्री को जब यात्रा करने गए विदेश.
ले कुर्सी फिर इन्द्रा रानी अपनी लगी करन मनमानी.
दिया कटा नस सब पुरुषों की बतलाया जिसको नादानी.
लगी पटखनी गिरी ढुनमुनी गावन लागी गीत.
एक बार आज़ाद हिंद में भई फिर भ्रष्टाचार की जीत.

हिंद की जनता रही बेचारी किया नेक एक काम.
देख के आंसू राजीव जी के हिंद की दिया लगाम.
भारत वर्ष की रक्षा खातिर लिया तोप बोफोर्स.
खूब बनाया बुद्धू हमको लगा के अपना सोर्स
जांच नहीं पूरी हो पाई गयी जिंदगी बीत.
एक बार आज़ाद हिंद में भई फिर भ्रष्टाचार की जीत

हरे मुरारी अटल बिहारी लेकर आये एक बीमारी.
किया विकास आय टी युग का खुद तो बने रहे ब्रह्मचारी.
सारी दुनिया लिए मोबाईल सायकिल पर मारे स्टाईल
कही कही कम्प्यूटर बाबा लगे निकालन सबका खाता
दिया हवाला स्विस बैंक का बाबा भी गए पीट.
एक बार आज़ाद हिंद में भई फिर भ्रष्टाचार की जीत

एक बार आज़ाद हिंद में भई फिर भ्रष्टाचार की जीत
बार बार आज़ाद हिंद में भई यारों भ्रष्टाचार की जीत .

                                                           राज शुक्ल  ….

गरिमामयी भारत बर्ष’

सांस भी लूँ तो मेरे लबों पर नाम तेरा ही आता है.
सोच के जिनको आज जहाँ का हर कोना थर्राता है.

उत्तर दिशा हिमालय छाया दक्षिण में सागर लहराया .
पूरब झूमे है वन उपवन पश्चिम दिल को लुभाता है.

सोच के जिनको आज जहाँ का हर कोना थर्राता है.

गंगा यमुना बहती कल कल, विन्ध्य सतपुड़ा खड़ा है अविचल.
विश्व की सबसे उच्च कोटि का, भारत ही निर्माता है.

सोच के जिनको आज जहाँ का हर कोना थर्राता है.

खान पान सम्मान में न्यारा, प्यारा भारत बर्ष हमारा.
दुश्मन को भी मान दे पूरा, प्यार से सब समझाता है.

सोच के जिनको आज जहाँ का हर कोना थर्राता है

मैंने तुझे एक ख्वाब में देखा, तू है अपने भाग्य की रेखा.
ख्वाब हकीकत कर पाने को हर इंसा इतराता है.

सोच के जिनको आज जहाँ का हर कोना थर्राता है.

  —– रचयिता  – राज गोपाल शुक्ल  “अवध”

आजु के जबाना मा सगरव संसार एक बहुत बड़े भरम मा पड़ा बाय. सबके लगे खाय के कमी नाही अहै लेकिन तब्बव कहा जात बाय कि सगरव संसार मा आर्थिक मंदी छाई अहै. येहके पीछे कवनव न कवनव बतकही जरूरै अहै. चहै ऊ अमरीका हुवे अउर चहै भारत. अब ई बात हमरे हिसाब से ठीक नाही जनाय पडत कि एक आम मनई का दुई जून कई रोटी अउर अपने हिसाब से सायकिल मोटर सायकिल या फिर एकाध ठू कार से काम चली जात है तव वोहमा बहुत पैसा खर्चा कइके लक्जरी के पिछवा बर्बादी करय कई कवन जरूरत अहै. का ओहसे ४०० साल ज़िंदा रहै कै जुगाढ़ है जाये अउर जव ८० से १०० साल कि जिन्दगी मा खाली आपन खोंधा भरेव केहू अउर की तायीं कुछू नाही किहव तव झूटी शान देखाए कवन फायदा. आपन झूठी शान का बचावे कि तायीं दुसरे के ऊपर बोझ कहे डरा चाहत हव. अरे भईया बड़का साहब बनी जाबो तव काव करबो. चार ठू चपरासी का परेशान करबो. वे भले मुह पै ना कहे लेकिन उनके बाल बच्चा उठत बैठत मन मा जरूर गरियेहई. मंत्री बनी जाबो तव लूट मार मचव्बो जैसे आज कल के नेता लोगे करत है. अकेल ज़िव बचावे कि तायीं सैकडन सुरक्षा वाले वोह्के पीछे हजारन चमचा का तुहका नाही पता अहै कि वे तोहरे पीछे मुफ्त मा नाही घूमते. अरे भईया एक दिन तव मरयिन का अहै काहे येतना बर्बादी करत हव. लेकिन भईया चाहे हम अवधी मा लिखी या अंगरेजी मा. यहि संसार के मनयीं के काने पै जुवां नाही रेंग सकत. तव चाहे आर्थिक मंदी झेलव या फिरि परलय. मर्जी तोहर. कैहव न कैहव सबकै नंबर जरूर लागे. – राज

आजकल के नौजवान १५-२५ बर्ष वाले अत्यंत ही बिगडैल और बदतमीज़ होते जा रहे है. इनके ऊपर ना तो किसी प्रकार का रोकटोक है और न ही मार्गदर्शन. सड़को पर तीव्र गति से वहां चलाना, समय कुसमय अनजाने नंबरों पर सन्देश, शराब का नशा आदि कुछ ऐसे उदाहरण है जिससे वे स्वयं को तो गुमराह कर ही रहे है वरन अन्य लोगो के जीवन में अनचाही दखलंदाजी  करते है. हमारे प्रशासनिक कर्मी भी लाचार है. किसी को कुछ कहने की स्थिति में नहीं है. यह सरकार तो वैसे भी अंधी है जानबूझ कर पाश्चात्य सभ्यता के पीछे दौर रही है. हमारे समाज सेवक व मीडिया कर्मी भी इन्ही का साथ देते नज़र आ रहे है.  रोजाना अश्लील फिल्मो का निर्माण इसका एक साक्षात् उदाहरण है. यदि किसी को कुछ कहो तो वो बेशर्म होकर अश्लीलता की सीमा दिखाने लगता है. कुछ लोग तो फेश बुक और गूगल आदि सामाजिक स्थलों पर ऐसी तस्वीरो को मुख्य तस्वीर लगाने में भी नहीं संकोचते. जब सब कुछ  बदल गया यहाँ तक कि वयस्क शिक्षा बच्चों को दी जाने लगी तो क्या बचपन की सीमा  कुछ घटाकर १०-१२ साल क्यों नहीं कर दी जाती. सभी मोबाइल व वाहन चलने वाले बच्चों को कठोरतम कानूनों  के दायरे में क्यों नहीं लिया जा रहा है.  क्या इससे सरकार गिर सकती है या फिर बड़े लोगो के लाडले जेल की सैर भी कर सकेगे. संभवतः ये सब अपनी बाते ऊपर कर दिखाने की बातें है. इससे हमारे समाज में सुधार ही हो सकेगा.