आजकल के नौजवान १५-२५ बर्ष वाले अत्यंत ही बिगडैल और बदतमीज़ होते जा रहे है. इनके ऊपर ना तो किसी प्रकार का रोकटोक है और न ही मार्गदर्शन. सड़को पर तीव्र गति से वहां चलाना, समय कुसमय अनजाने नंबरों पर सन्देश, शराब का नशा आदि कुछ ऐसे उदाहरण है जिससे वे स्वयं को तो गुमराह कर ही रहे है वरन अन्य लोगो के जीवन में अनचाही दखलंदाजी  करते है. हमारे प्रशासनिक कर्मी भी लाचार है. किसी को कुछ कहने की स्थिति में नहीं है. यह सरकार तो वैसे भी अंधी है जानबूझ कर पाश्चात्य सभ्यता के पीछे दौर रही है. हमारे समाज सेवक व मीडिया कर्मी भी इन्ही का साथ देते नज़र आ रहे है.  रोजाना अश्लील फिल्मो का निर्माण इसका एक साक्षात् उदाहरण है. यदि किसी को कुछ कहो तो वो बेशर्म होकर अश्लीलता की सीमा दिखाने लगता है. कुछ लोग तो फेश बुक और गूगल आदि सामाजिक स्थलों पर ऐसी तस्वीरो को मुख्य तस्वीर लगाने में भी नहीं संकोचते. जब सब कुछ  बदल गया यहाँ तक कि वयस्क शिक्षा बच्चों को दी जाने लगी तो क्या बचपन की सीमा  कुछ घटाकर १०-१२ साल क्यों नहीं कर दी जाती. सभी मोबाइल व वाहन चलने वाले बच्चों को कठोरतम कानूनों  के दायरे में क्यों नहीं लिया जा रहा है.  क्या इससे सरकार गिर सकती है या फिर बड़े लोगो के लाडले जेल की सैर भी कर सकेगे. संभवतः ये सब अपनी बाते ऊपर कर दिखाने की बातें है. इससे हमारे समाज में सुधार ही हो सकेगा.

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