गरिमामयी भारत बर्ष’

सांस भी लूँ तो मेरे लबों पर नाम तेरा ही आता है.
सोच के जिनको आज जहाँ का हर कोना थर्राता है.

उत्तर दिशा हिमालय छाया दक्षिण में सागर लहराया .
पूरब झूमे है वन उपवन पश्चिम दिल को लुभाता है.

सोच के जिनको आज जहाँ का हर कोना थर्राता है.

गंगा यमुना बहती कल कल, विन्ध्य सतपुड़ा खड़ा है अविचल.
विश्व की सबसे उच्च कोटि का, भारत ही निर्माता है.

सोच के जिनको आज जहाँ का हर कोना थर्राता है.

खान पान सम्मान में न्यारा, प्यारा भारत बर्ष हमारा.
दुश्मन को भी मान दे पूरा, प्यार से सब समझाता है.

सोच के जिनको आज जहाँ का हर कोना थर्राता है

मैंने तुझे एक ख्वाब में देखा, तू है अपने भाग्य की रेखा.
ख्वाब हकीकत कर पाने को हर इंसा इतराता है.

सोच के जिनको आज जहाँ का हर कोना थर्राता है.

  —– रचयिता  – राज गोपाल शुक्ल  “अवध”

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